*क़ुरआन पाक*
*पारा-1*
इस पारे में दो सूरतें हैं
*1* -सूरह फातेहा
*2* -सूरह बक़रह का कुछ हिस्सा
➡ *सूरह फातेहा की फ़ज़ीलत* - सूरह फातेहा पहली सूरह जो मुकम्मल नाज़िल हुई, औऱ मक्का मुक़र्रमा में नबूवत के इब्तेदाइ औऱ दावत के ख़ुफ़िया दौर में नाज़िल हुई
➡ *नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम* ने फ़रमाया ! '' अल्लाह की क़सम इस जैसी सूरह न तो तौरात में नाज़िल हुई, न इंजील में, न ज़बूर में औऱ न ही फुरकान में
➡सूरह फातेहा के अंदर बंदों को अल्लाह के हुज़ूर दुआ मांगने का तरीक़ा भी सिखाया गया है कि सबसे पहले अल्लाह की हम्दो सना बयान की जाए, औऱ सबसे पहले हिदायत की दुआ मांगनी चाहिए, क्यूंकि हिदायत इंसान की क़ामयाबी की पहली सीढ़ी है
➡सूरह फातेहा में क़ुरआन मजीद के तमाम मज़ामीन (topics) को इख्तेसार (संक्षिप्त में) के साथ बयान कर दिया गया है
➡सूरह फातेहा बंदे की तरफ़ से अल्लाह के हुज़ूर में दुआ है, क्यूंकि इसमे बन्दा अपने रब के हुज़ूर दुआ करता है *हमें सीधा रास्ता दिखा, उन लोगों का रास्ता जिनपर तेरा इनाम हुआ, न कि जिनपर तेरा गज़ब हुआ औऱ न गुमराहों के*
➡ *सूरह बक़रह* - इस सूरह के अंदर सबसे पहले हिदायत व ज़लालत के ऐतबार से इंसान की तीन-3 किस्में बयान की गई हैं
*1* - मोमिनीन
*2* - काफेरीन
*3* - मुनाफेकीन
( तफसील के लिए आयत 1 से 20 तक देखिए )
➡इसके बाद अल्लाह ने तमाम इंसानों को मुख़ातिब करके अपनी इबादत का हु़क्म दिया है, जो इंसान की पैदाइश का असल मक़सद है
➡हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तखलीख (पैदाइश) औऱ फरिश्तों का आदम अ स को सजदा करना औऱ इब्लीस का सजदा करने से इनकार करना
➡इल्म की अहमियत औऱ उसका मकाम औऱ मर्तबा
➡किस चीज़ की इत्तेबा (फ़रमा बरदारी) करनी है
➡बनी इस्राइल की फ़ज़ीलत औऱ उनका अंजाम
➡बनी इस्राइल से अल्लाह के किए हुए मुख़्तलिफ़ अहदो मुआहेदे, औऱ उनको पूरा करने की तल्कीन
➡जादू का हु़क्म औऱ उसके नुकसानात का तज़केरा
➡नबी करीम स अ की इज़्ज़त करो औऱ उनके लिए नामुनासिब अल्फ़ाज़ अपनी ज़बान से मत निकालो
➡सिर्फ़ ख़्वाहिशात औऱ कह लेने से बात नहीं बनती, उसके लिए दलील औऱ अमल की ज़रूरत होती है
➡हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम का ज़िक्रे ख़ैर औऱ उनकी दुआएं
➡ईमान कैसा होना चाहिए
➡किसी को बुरा न कहें खुद अच्छे बने औऱ दूसरों को अच्छा बनाने की कोशिश करते रहें, किसी की ज़ात पर कीचड़ न उछालें
(वल्लाहो आलम-औऱ अल्लाह बेहतर जानने वाला है)
*आओ क़ुरआन सीखें व्हाट्सएप ग्रूप*
*कुरआन पाक*
*तीसरा पारा*
➡️इस पारे में दो हिस्से हैं:
*1- बची हुई सूरह बकरह*
*2- सूरह अल-इमरान की शुरुआत*
*(पहला हिस्सा)* सूरह बक़रह के बचे हुए हिस्से में तीन बातें हैं:
*1-* दो बड़ी आयतें, *2-* दो नबीयों का ज़िक्र, *3-* सदक़ा और सूद
*1- दो बड़ी आयतें*
एक आयतल कुर्सी है जो फ़ज़ीलत मे सबसे बड़ी है, इसमें सत्तरह मर्तबा अल्लाह तआला का ज़िक्र है
दूसरी आयत आयते दैन जो मिक़्दार मे सबसे बड़ी है इसमें तिजारत (व्यापार) और क़र्ज़ का ज़िक्र है
*2- दो नबियों का ज़िक्र*
एक हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम का नमरूद से मुबाहसह (Discussion) और अहयाए मौता (मौत के बाद दुबारा ज़िन्दगी देना) के मुशाहेदे (देखने) की दुआ, दूसरे ओज़ैर अलैहिस्सलाम जिन्हें अल्लाह तआला ने सौ साल तक मौत देकर फिर ज़िन्दा किया
*3- सदका और सूद*
बज़ाहिर सदके से माल कम होता है और सूद से बढ़ता है, मगर हक़ीक़त मे सदके से बढ़ता है और सूद से घटता है
*( दूसरा हिस्सा)* सूरह अल-इमरान का जो इबतेदाई हिस्सा इस पारे मे है उसमे चार बातें हैँ :
*1- सूरह बक़रह से मुनासबत (मिलती जुलती)*
*2- अल्लाह तआला की कुदरत के चार किस्से*
*3- अहले किताब से मुनाज़रह (हुज्जत, बहस) , मुबाहलह (एक दूसरे के हक़ मे बद्दुआ करना), मुफाहमह*
*4- अम्बियाए साबेकीन से अहेद*
*1- सूरह बक़रह से मुनासबत*
मुनासबत यह है की दोनों सूरतो मे क़ुरआन करीम की हक्कानीयत (हक़ पर होना) और अहले किताब से खेताब है, सूरह बक़रह मे अक्सर खेताब यहूद से है जबकि सूरह अल-इमरान मे अक्सर रुए सोखन नसारा (ईसाई) की तरफ है
*2- अल्लाह तआला की कुदरत के चार किस्से*
पहला किस्सा जंगे बद्र का है तीन सौ तेरह ने एक हज़ार को शिकस्त दे दी, दूसरा किस्सा हज़रत मरियम अलैहिस्सलाम के पास बेमौसम फल के पाए जाने का है, तीसरा किस्सा हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम को बुढ़ापे मे औलाद अता करने का है, चौथा किस्सा हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का बगैर बाप के पैदा होने, बचपन ही मे बोलने और ज़िन्दा आसमान पर उठाये जाने का है
*3- अहले किताब से मुनाज़रह, मुबाहलह, मुफाहमह*
अहले किताब से मुनाज़रा हुआ, फिर मुबाहेला हुआ कि तुम अपने अहलो अयाल को लाओ, मैं अपने अहलो अयाल को लाता हूँ, फिर मिल कर ख़ुशुअ व खुज़ुअ से अल्लाह तआला से दुआ मांगते हैँ कि हममे से जो झूठा है उसपर अल्लाह की लानत हो, वो तय्यार न हुए तो फिर मुफाहमह हुआ यानि ऐसी बात की दावत दी गई जो सबको तस्लीम हो और वह है कलमए "ला इलाह: इल्लल्लाह"
*4- अम्बियाए साबेकीन से अहेद*
अम्बियाए साबेकीन से अहेद लिया गया कि जब आखिरी नबी आए तो तुम उसकी बात मानोगे, उसपर ईमान लाओगे, और अगर तुम्हारे बाद आये तो तुम्हारी उम्मतें उस पर ईमान लाएं
(वल्लाहो आलम- और अल्लाह बेहतर जानने वाला है )
*معمولی عمل ثواب زیادہ*
أَنّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَ: مَنْ قَالَ فِي السُّوقِ:
*لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ يُحْيِي وَيُمِيتُ وَهُوَ حَيٌّ لَا يَمُوتُ بِيَدِهِ الْخَيْرُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ،*
كَتَبَ اللَّهُ لَهُ أَلْفَ أَلْفِ حَسَنَةٍ وَمَحَا عَنْهُ أَلْفَ أَلْفِ سَيِّئَةٍ وَبَنَى لَهُ بَيْتًا فِي الْجَنَّةِ.
رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا: ”جو شخص بازار جاتے ہوئے یہ دعا پڑھے: *«لا إله إلا الله وحده لا شريك له له الملك وله الحمد يحيي ويميت وهو حي لا يموت بيده الخير وهو على كل شيء قدير»* ۱؎ تو اللہ اس کے لیے دس لاکھ نیکیاں لکھ دے گا اور دس لاکھ اس کے گناہ مٹا دے گا اور جنت میں اس کے لیے ایک گھر بنائے گا۔
📚 جامع ترمذی 3429
نوٹ... یہ دعاء صرف بازار کے لئے خاص نہیں بلکہ عام حالت میں بھی پڑھی جا سکتی ہے؛ چلتے پھرتے اٹھتے بیٹھتے ہر ممکن اس دعا کا اہتمام کرنا چاہیئے
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🌴 *اردو نصیحتیں*🥀
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